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سالک ره کرده چون ره کرد و رفت
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همچنان چون برق تازان می برفت
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در رسید او پردهٔ هفتم تمام
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خویشتن بالای اشیا یافت او
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وان نهانی راز پیدا یافت او
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پرده در آنجا عجایب مینمود
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بود آنجا لیک دربود و نبود
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پرده رفته ذات بی وصف و صفت
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جایگاهی دید او برتر ز جسم
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هرکه آن جا رفت بیرون شد ز اسم
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بود آن جا ایستاده پرده دار
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جایگاهی بود چون بحری لذیذ
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جایگاهی یافت بیرون از خیال
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چون در آن کون پر از عزّت رسید
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یک تنی از ذات پاک او بدید
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نور تحقیق و عیان اندر عیان
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پای تا سر جمله از نور اله
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بر صفت مانندهٔ نوری بد او
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گوییا خود نیز چون حوری بداو
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بر صفت او را نه سر بود ونه پای
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جای او از حد گذشته بی صفت
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چون کنم این را کمالی بر صفت
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بود پیری لیک بدهم جفت نور
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دفتری در دست و معنی پر عدد
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چوهری کان از دو عالم بیش بود
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سر ز هیبت درفکنده پیش بود
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عکس آن جوهر به از نور یقین
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سالکان را پیش رو او راه بین
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عکس آن جوهر فروغ ذات داشت
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روی با آن دفتر و آیات داشت
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یک ستونی پیش او استاده بود
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نورها ازعکس آن بگشاده بود
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عکس جوهر بر ستون افتاده بود
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بر ستون کون و مکان بگشاده بود
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آنکه این دریافت نه از نقل یافت
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عکس جوهر لامکان بگرفته کل
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نور آن کون و مکان بگرفته کل
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عکس را بر ذات ذات اندر یقین
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کس ندیدش جز که مرد راه بین
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اندر آنجا بود نه جان و نه تن
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سالک ره کردهٔ بی جسم و جان
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خود بدیده برتر از کون و مکان
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سالک آنگه سوی آن تن باز شد
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کرد بروی از ارادت یک سلام
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داد وی در هر سلامی بی کلام
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بعد از آن گفتار سالک گوش کرد
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یک نفس بامن زمانی گیر انس
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عکس نور تو مرا اینجا نمود
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صد جهان اندر زمان اندر مکان
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پرتو نور تو اینجا راه یافت
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تا دو چشم جان من ناگاه یافت
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پیش خود هم با وجودت در عدم
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این چه جای است این رموز لم یزل
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راز بر گو تا کنم جان بر بدل
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پرتو تو هم مکان و هم مکین
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راست برگوی و مرا راهی نمای
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راه ما را تو برمزی برگشای
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کز کجا اینجا فتادم ناگهان
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نور دایم کن پیاپی در بیان
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از کجا اینجا فتادم بی قرار
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کین قراراین جا ندارد خود کنار
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از کجا اینجا دگر راهی برم
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نیست چیزی عکس نورست این زمان
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با من این راز حقیقت کن عیان
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نیست پیدا هیچکس هیچی نمود
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این همه بر هیچ باشد بی وجود
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نیست پیدا آسمان و هم زمین
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نیست پیدا هم مکان و هم مکین
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نیست پیدا آتش بادست و باد
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آب و خاک آنجا کجا آید بباد
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نیست تحتی فوق آخر در که رفت
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نیست پیدا هست باری در چه رفت
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نیست پیدا نیست اشیا نقشها
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نیست پیدا چون کنم این نقشها
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با من سرگشته اکنون راز گوی
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آنچه تو دانی ابا من باز گوی
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راه کردم بی حد و بی منتها
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این زمانم دم بدم شوقی رسید
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راه بی حد کردم اندر پرده من
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تا برون بردم ازآنجا خویشتن
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دیدم و دیدم ز دیده شد نهان
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بس که جائی نی مکانست و زمان
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دیدم آنجا محو محو اندر یکی
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این چنین جائی که اینجا آمدم
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چون در این جا گاه پیدا آمدم
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من عجایب در عجب دیدم کنون مر مرا راهی نما ای رهنمون
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