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بگویم با تو رمزی چند ز اسرار
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چو دانش داری و هستی خردمند
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بیاموز از فتوت نکتهای چند
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که تادر راه مردان ره دهندت
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اگر خواهی شنیدن گوش کن باز
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که از مردی زدندی در میان دم
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که: هفتاد و دو شد شرط فتوت
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بگویم با تو یک یک جملهٔ راز
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که تا چشمت بدین معنی شود باز
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نخستین، راستی را پیشه کردن
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چو نیکان از بدی اندیشه کردن
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همه کس را بیاری داشتن دوست
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نگفتن: آن یکی مغز و دگر پوست
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همیشه پاک باید چشم و دامن
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همه کارش بجز روی و ریا نیست
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کسی،کو را جوانمردیست در تن
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ببخشاید دلش بر دوست و دشمن
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اگر خواهی بخود، نبود زیانت
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مکن بدبا کسی کو باتو بدکرد
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تو نیکی کن، اگر هستی جوانمرد
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زبان را در بدی گفتن میآموز
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پشیمانی خوری تو هم یکی روز
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ترا آنگه به آید مردی و زور
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که بینی خویشتن را کمتر ازمور
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مگو هرگز که: خواهم کردن اینکار
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کسی کو را بخشم اندر رضانیست
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فتوت درجهان او را روا نیست
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نباشد در جهانش هیچ کس یار
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درین ره خویشتن بینی نگنجد
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نه گرمی ستیزه، بلکه زاریست
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بده نان، تا برآید نامت،ای دوست
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چو خوشتر درجهان ازنام نیکوست؟
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زبان ودل یکی کن با همه کس
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چنان کز پیش باشی، باش از پس
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مکن چیزی،که دیدن را نشاید
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که نیکو نیست فاسق را سرانجام
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مکن با هیچکس تزویر و دستان
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که حیلت نیست کار زیردستان
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درون را پاک دار از کین مردم
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که کین داری نشد آیین مردم
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چو خواندندت برو، زنهار میپیچ
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ورت هم بیم جان باشد،مگو هیچ
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بجان گر با زمانی اندرین راه
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دماغ از کبر خالی دار پیوست
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ز شیطانی چه گیری عذر بردست؟
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سخن نرم و لطیف و تازه میگوی
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نه بیرون از حد و اندازه میگوی
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مگو راز دلت با هر کسی باز
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که در دنیا نیابی محرم راز
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اخی را چون طمع باشد بفرزند؟
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ببر، زنهار، از وی مهر و پیوند
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اگر گفتی ز روی، آنرا بجا آر
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وگر خود میرود سر بر سردار
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ریاضت کش، که مرد نفس پرور
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بود از گاو و خر بسیار کمتر
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مرو ناخوانده، تا خواری نبینی
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چو رفتی جز جگر خواری نبینی
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که دشمن کام گردی، ای برادر
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ز کج بینان فتوت راست ناید
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بکام خود منه زنهار! یک گام
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که ایمن نیست دایم مرد خودکام
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هزاران تربیت گر هست اخی را
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ندارد دوست زیشان جز سخی را
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مدارا کن تو با پیران مسکین
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مزن لاف ای پسر، بادوست و دشمن
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که باشد مرد لافی کمتر از زن
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هر آن کس، کو بخود مغرور باشد
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ادب را گوش دار اندر همه جای
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بخدمت میتوان این ره بریدن
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بدین چوگان توان گویی ربودن
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چو یاری کردی اغیاری نبینی
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گر آید از درت سیلاب خون باز
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بعصیان در میفکن خویشتن را
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مده ره پیش خود صاحب هوارا
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چنان کن تربیت پیرو جوان را
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که خجلت برنیفتد این و آن را
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گره از جان و بند ازدل گشاید
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بگوش جان شنو این ماجرا را
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که باشد در کنارت همچو فرزند
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که بی دین را نزیبد لاف مردی
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مطیع امر کن تن را و جان را
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که هستی بر نمیآیی ازین فن
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در آن حالت مکن از صبر دوری
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بنعمت در،همی کن شکر یزدان
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چو محنت در رسد صبرست درمان
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چو مهمان در رسد شیرین زبان شو
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تکلف از میان بردار و از پیش
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بیاور آنچه داری از کم و بیش
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باحسان و کرم دلها بدست آر
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کزین بهتر نباشد در جهان کار
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چو احسان از تو خواهد مرد هشیار
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چو مردان راه خود چالاک بسپار
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اگر شکرانهای گوید مگو: کی؟
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فتوت دار چون شمعست در جمع
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از آن سوزد میان جمع چون شمع
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ترا با عشق باید صبر همراه
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که تاگردی از این احوال آگاه
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بگفتار این سخنها راست ناید
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چو چشمت روی آن هستی ببیند
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مکن زنهار! ازین معنی فراموش
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همی کن پند من چون حلقه در گوش
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گر این معنی بجا آری، ترا به
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بشرط این راه بسپاری، ترا به
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اگر خواهی که این معنی بدانی
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خدا یار تو باشد در دو عالم چه مردانه درین ره میزنی دم
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